आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शिद्दत से ज़िनसे मुहब्बत किया था

                
                                                         
                            शिद्दत से ज़िनसे मुहब्बत किया था
                                                                 
                            
ज़िनके लिये दिल दुआयें दिया था

पता अब चला है दगाबाज थे वो
ज़िनके लिये दिल खुद से लड़ा था

मुहब्बत को जब मेरे रुस्वा किया था
आँखो के आँशू को मैंने पिया था

मिला क्या मेरा दिल तुम्हें तोड़कर
संभाले रखा था ज़िसे जोड़कर

सुन मेरी मुहब्बत ना कोई भरम है
ना कोई सिकवा ना कोई शर्म है

दिल ने तुझे माफ भी कर दिया है
मुहब्बत का इंसाफ भी कर दिया है

दिल ना किसी का अब दुखाईयेगा
मुहब्बत जो की तो निभाईयेगा


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर