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रब की बारगाह में मैं सिज्दा कर रहा हूं

                
                                                         
                            रब की बारगाह मे मैं सिज्दा कर रहा हूँ
                                                                 
                            
सबके लिये मैं रब से ईलतिजा कर रहा हूँ
अपने गुनाह की रब से माफी मैं मांग कर
सबके लिये रब से मैं दुआयें मांग रहा हूँ
परवरदिगार मेरे करम मुझपे कीजिये
महसूस मेरे दिल की सदा को भी कीजिये
भर दीज़िये मुझमे मजबूत हौंसलों को
अपने करम से रब मुझे नवाज दीज़िये
मेरे दिल मे ये कमी हैं कोई अपना ही नहीं है
रब रहमतों की अपने बरसात कीजिये
मुश्किलों की फेहरिस्त बढ़ती ही जाती है
अपनी निगाहें परचम से ज़िन्दगी आसान कीजिये
लोगो मे खूब भरम है पर इल्म कम ही कम है
रब्बी ज़िदनी इलमा की शुरुआत कीजिये
रब ज़िन्दगी की मुश्किलों को जीत मैं चलूँ
रब मेरे लिये खुशनुमा हालात कीजिये

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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