सुप्रीम मंडी बाराखंबा
करता रहा सफर
अब जाके ये पता चला है
दूर बहुत है घर
चौक से चलकर राम कृष्ण तक
पग पग किया सफर
झंडे मे हनुमान अलौकिक
फिर भी दूर है घर
मार्केट देखा बाग करोल
शानदार कुछ सुन्दर फूल
फिर गाड़ी मेरी सरपट भागी
पहुँचा दी प्लेस अनमोल
माथा पकड़ा सर भी पीटा
कब तक पहूँचूंगा घर
तब तक गाड़ी पहुँच गयी थी
पटेल नगर पर
शादी और शादीपुर में
कीर्ति खूब बढ़ाई है
मोतीचूर के लडडू भी
रमेश के संग खायी है
राजौरी फिर टैगोरी में
गार्डन गार्डन खेला है
सुभाष से फिर मिलकर के
माथे पे तिलक को रेला है
नत मस्तक हो गया दोस्तों
जनकपुरी की नगरी में
चेहरे पर मुस्कान बही है
कि दूर नहीं अब घर
उतर ट्रेन से जल्दी निकला
पकड़ी दो पहिया की गाड़ी
पहुँच गया मैं घर
अहा पहुँच गया मैं घर
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