मैं रद्दी का सामान कभी था
ज़िद की एक दुकान कभी था
ठोकर खाकर संभला हूँ मैं
ज़िसका मैं अरमान कभी था
वक़्त की जानिब मैंने देखा
कौन है अपना कौन पराया
सच की मूरत बनकर भी मैं
तेरे धोखे से अंजान कभी था
मेरी उम्मीदों ने खूब रुलाया
खूब तड़पाया और उलझाया
दिल के फरेबों मे पड़कर मैं
दिवाना इंसान कभी था
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X