आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

माटी की मूरत है तू

                
                                                         
                            माटी की मुरत है तू
                                                                 
                            
करता है क्यूँ घमंड
माटी मे मिलना है सबको
मत कर तू हुडदंग
ईश्वर की रचना है सब
लीला उसकी न्यारी है
दुनिया को है गढ़ने वाला
हर चीजें उसकी प्यारी हैं
जीवन सबका ईश्वर के
पास पड़ा है अधीन
प्यार से रहना सीख लो
ऐ मानुष बुद्धिहीन
ईश्वर है एक काल स्वरूप
कण कण में वह व्याप्त है
दुखियों के दुख हरने की
हर शक्ति उनको प्राप्त है
धरती पर मानव जीवन का
कार्य सेवा ही चरितार्थ है
द्वेष धर्म का जीवन में
कोई नही परमार्थ है
सबकी सेवा सबको प्यार
मानुष का कर्तव्य है
वरना जीवन मानुष का
पूर्ण रुप से व्यर्थ हैं


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर