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जो भूल गया अपनापन

                
                                                         
                            जो भूल गया अपनापन ही
                                                                 
                            
उसकी शिकायत क्या करना
प्यार में ड़ूबे पागल की
यार हिफाजत क्या करना
ज़िसमे समझ ना हो
अपना कौन पराया कौन
उसे दिल में रख कर रोने की
यार हिमाकत क्या करना
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।  आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे
4 वर्ष पहले

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