आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जहां पर मैंने जन्म लिया

                
                                                         
                            जहां पर मैंने जन्म लिया , जहां मिला माँ का आँचल
                                                                 
                            
जहां पिता की गोदी में ,मैंने ऊछलना सीखा

जहां सुनी दादी से लोरी ,बड़ी बहन संग चलना सीखा
जहां बड़े भाई से मैंने ,अच्छे से पढ़ना सीखा

वह जन्मस्थली शोहरतगढ़ है , जहां पर मैंने जन्म लिया
जब से हम सब बड़े हुए ,ज़िम्मेदारी बढ़ गयी

बचपन की मासूमियत ,ज़िम्मेदारी में बदल गए
चेहरे की मुस्कान की रंगत फिके पड़ गये

नौकरी के चक्कर में ,जब घर से दूर निकल गए
काम काज करते करते ,उलझनो में फँस गए

फ़ोन ही अब बातचीत का ,एकमात्र सहारा बन गया
जीवन मेरा अब तो एक उम्मीद का तारा बन गया

क्यों हो जाते हैं हम , अपनों से इतनी दूर
य़ा रब कुछ ऐसा कर , अपनों से हो मिलना भरपूर

कितनी मुसीबत ज़िन्दगी में झेलनी बाकी तस्वीर
ज़िन्दगी हो अच्छी मान धीरे धीरे बढ़ गए


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर