इश्क के चक्कर में पड़ कर मैं
हर सपने से आजाद हुआ
बनना था मुझे जिला कलेक्टर
इश्क मे पड़ लाचार हुआ
इश्क का रोग लगा है जबसे
बहुत बुरे हालात रहे
छोड़ मोहब्बत निकल गई वो
दिल रो रो कर बर्बाद हुआ
जब देखा अपनो का गुस्सा
हालत मेरी हुई खराब
घर वालों के असली प्यार का
आज मुझे एहसास हुआ
पल पल खूब बदलते चेहरे
इस इश्क मे पड़ कर देखें हैं
सपने आज धरातल पर हैं
दिल का सच से गठज़ोड हुआ
प्यार करो उम्मीद ना पालो
मेहनत करते जाओ बस
नाम करो माँ बाप का रोशन
यही सत्य संजोग हुआ
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