हे मानुष कुछ दम्भ ना कर
धरती के मेहमान हो तुम
जो आया है सब जायेगा
सत्य से ना अंजान हो तुम।
जो सबका वक़्त मुकर्रर करता
वो आसमान से देख रहा
सबके पाप पुन्य का लेखा
रोज ही वह उसे लिख रहा।
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