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हादसो के डर से दिल खोने लगता है

                
                                                         
                            हादसों के डर से दिल खोने लगता है
                                                                 
                            
माँ की तकलीफ देख दिल रोने लगता है
दूरियों की वजह से मजबूर हो गया हूँ
मन मेरा अब खुद पर गुस्सा होने लगता है

बच्चे जब बड़े होकर आँख दिखाते हैं
हर चीज पर अपनी धौस जमाते हैं
बीवी के पल्लू में घुसकर बात बनाते हैं
धैर्य मेरा ऐसे लोगों पर खोने लगता है
मेरा मन उनपर गुस्सा होने लगता है
मेरा मन उनपर गुस्सा होने लगता है

जिसने तुमको पैदा करके पाला पोसा है
ज़िन्दगी में साथ से ज़िनके तुमने चलना सीखा है
उम्र हो गयी तो क्या उनसे जबाँ लडाओगे
ज़िन्दगी के हर लम्हें क्या उन्हें सताओगे

जिसने तुमको कभी भी भूखा नहीं छोड़ा
तुम उनको खाने के लिये कितना सताओगे
बीवी के वजह से माँ को क्या गाली सुनाओगे
जिसके कोंख से जन्म लिया क्या उसे दोषी ठहराओगे

जो जैसा फल बोयेगा वह वैसा ही फल पायेगा
रब की बारगाह मे वह कभी ना बख्शा जायेगा
औलाद अगर ऐसे हों तो औलाद की चाहत क्या करना
रब की बनायी दुनिया मे बेईमान ना बख्शा जायेगा


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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