आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दिल के कारोबार मे

                
                                                         
                            दिल के कारोबार मे अजब गजब से लफड़े है
                                                                 
                            
इश्क के बाजार मे हम अदने से मोहरें हैं

माना कि इस दुनिया में सब मिलना मुमकिन नही
जालिम इस संसार मे बहुत बहुत से पहरे हैं

उम्मीदों की चाहत के ज़ख्म बहुत ही गहरें हैं
इश्क के मयखाने मे पल पल बदलते चेहरें हैं

इश्क की मासुमियत के खूब सारे नखरे हैं
दिल्लगी मे ज़िन्दगी के खूब सारे खतरें हैं

मुकम्मल इश्क से ही ज़िन्दगी गुलजार है तस्वीर
कमी रह जाती है जो ज़िन्दगी के कचरे कचरे हैं

मोहम्मद तस्वीरूल इस्लाम

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर