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भृकुटी तानी

                
                                                         
                            देश की राजधानी
                                                                 
                            
सुनती रही कहानी
करने को था बहुत कुछ
पर उसने भृकुटी तानी

मन मर्जी की चलती है
बात पता सब करती है
कैसे हो समाधान मनुष्यता का
आँख बंद कर सहती है

हथिनी और उसका अजन्मा बच्चा
मौत से अंजान जीना चाहता था
पर हे निरलज्ज मनुष्य
तुमने जीवन छीन लिया

क्यों ना हो प्रकृति नाराज
ऐसे पापी दानव से
क्यों ना करे समूल विनाश धरती का
ऐसे क्रूर पिशाचों से

मानव तुम मानवता लाओ
मन मंदिर मे प्रेम जगाओ
मानव जानवर प्यार से रहे
राजधानी कुछ नियम बनाओ

मानव की प्रकृति प्रेम है
उसमे नर पिशाचों का स्थान नहीं
उनकी जगह है काल कोठरी
उसे मौत मिले जीवनदान नहीं

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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