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बचपन सपना

                
                                                         
                            कागज के मैं नांव बना कर
                                                                 
                            
पानी पर उसको दौड़ाता
जादू मंतर के बलबूते
आसमान मे सैर को जाता

स्वर्ग लोक मे परियों से मिल
प्रेम की पींगे खूब पिलाता
सबको मोहक हंसी से अपने
घायल कर दिल मे बस जाता

सबको अपने मोहपाश मे कर
खेल अनोखे खूब दिखाता
सबको बुला बुला कर मैं तो
प्यार के सारे पाठ पढ़ाता

खूब कहानी सुन सुन कर मैं
ग्यान मैं अपने खूब बढ़ाता
सबके दिल को खुश करने को
मन मोहक मुस्कान मैं लाता

मैं विश्व के सारे गम को
दूर बहुत ही दूर ले जाता
सबके मन मे खुशियाँ भर मैं
आसमान मे ज़श्न मनाता

निकल मैं जाता दूर कहीं मैं
माँ की आँख का तारा बन कर
खूब ग्यान का अर्जन कर के
वापस अपने घर को आता

खूब टहलता पापा माँ संग
देशाटन की सैर को जाता
जग की सारी तकलीफों को
पल भर मे छूमंतर कर जाता

नींद खुली तब पता लगा ये
सपना कितना हसीन है होता
य़ा रब बचपन लौटा भी दो
सपना सच करना सिखला दो
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2 वर्ष पहले

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