पूछूँगा कभी जाकर गुलशन में बहारों से,
क्या तुम भी जुदा होकर रोती हो सितारों से।
हम रात के पंछी हैं, उड़ जाएँगे सुबह को,
आती है सदा हमको दरिया के किनारों से।
पूछा ही नहीं तुमने इक बार भी ये हमसे,
क्यूँ अश्क छलकते हैं आँखों के किनारों से।
ख़ामोश निगाहों की तहरीर समझ लेना,
हम बात करेंगे अब नज़रों के इशारों से।
वो रूप तेरा अक्सर आँखों में उभरता है,
जब भी मैं गुज़रता हूँ इन हुस्न-नज़ारों से।
इस शहर-ए-तन्हाई में किससे कहें दिल की,
मैं बात किया करता हूँ घर की दीवारों से।
किस राह पे छोड़ी है ख़ुशबू मेरे अश्कों की,
पूछूँगा कभी जाकर गुलशन में बहारों से।
जो नायाब खिलौना भी बच्चें मेरे मांगेगें
मैं ढूंढ के लाऊँगा दुनियां के बज़ारों से
जब राह न सूझे तो आवाज़ हमें देना,
मैं रोशनी लाऊँगा इन चाँद-सितारों से।
चल उठ ऐ "जलाल" अल्लाह बुलाता है,
आती है सदा हक़ की मस्जिद के मीनारों से।
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