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                            हमने भी शुरू दोस्ती से किया था
                                                                 
                            
हर एक पल उसके साथ जिया था

वो उर्दू सी कोई मुकम्मल नज़्म थी
सुने उसको दुनिया वो ऐसी बज्म थी

खामोशी भी सुनती बड़ी गौर से वो
इतनी न खुली थी किसी और से वो

वो जर्रे बराबर भी बाते बताती
कभी तो मुझे गाना गा कर सुनाती

हया की चादर में लिपटी हुई वो
निगाहों की हद में सिमटी हुई वो

मैं ही क्या उसपे दुनिया फिदा थी
मगर वो न जाने क्यों सबसे जुदा थी
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3 वर्ष पहले

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