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मिल जाए इश्क़ हुस्न का सौदा किए बग़ैर

MIL JAAYE ISHQ HUSN KA SAUDA KIYE BAGHAIR
                
                                                         
                            वह रात हाए ! आरज़ू उसका किए बग़ैर
                                                                 
                            
आता है कोई ख़्वाब में वादा किए बग़ैर

मुझको पता है दिल में मेरे अब जो आ गए
जाओगे यूं न आप तमाशा किए बग़ैर

हिक़्मत कोई भी कर लो मगर बात है ये तय
अच्छा न कुछ भी पाओगे अच्छा किए बग़ैर

जलता जिगर है डूब के दर्या-ए-इश्क़ में
सहता है नाज़ हुस्न का चर्चा किए बग़ैर

मुश्ताक़ इस क़दर हूं के जाने ग़ज़ल तेरा
आती कहां है नींद नज़ारा किए बग़ैर

नख़रे तमाम और भी तीरे नज़र का वार
क्या क्या सितम सहा हूँ मैं शिक़्वा किए बग़ैर

क्या इस सिफ़त का ठौर है ग़ाफ़िल कहीं जहाँ
मिल जाए इश्क़ हुस्न का सौदा किए बग़ैर

- ‘ग़ाफ़िल’

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8 वर्ष पहले

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