जज़्बात को हर बार छुपाना नहीं आया!
दिल रोया बहुत फिर भी रुलाना नहींआया!
कुछ दर्द थे ऐसे जो बयां न हो सके!
हमको उन्हें अल्फ़ाज़ बनाना नहीं आया!
बरसों से सहेजे थे जो एहसास दिलों में!
उनको हमें बेमुरव्वत भुलाना नहीं आया!
लोगों ने पल पल अपने रंग बदले बहुत!
हमको मगर चेहरे पर चेहरा लगाना नहीं आया!
औरों के जज़्बात में अक्सर बह गए हम!
पर,पत्थर-सा दिल अपना बनाना नहीं आया!
- मीना गोपाल त्रिपाठी
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