अँधेरे लाख थे, फिर भी उजाला कम न हुआ!
उम्मीद के दिए को मैंने 'उसकी' अता समझी!!
कदम-कदम पर मिली ज़िंदगी से सीख कई!
हर एक फ़ैसले को मैंने 'उसकी' रज़ा समझी!!
न धूप से ही शिकायत की,न रात से की कोई गिला!
हर एक मौसम को मैंने 'उसकी' अता समझी!!
न माँगा तख्तो-ताज न शोहरतों का जहाँ 'उससे'
मेरे हिस्से में जो आया उसे 'उसकी' अता समझी!!
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