किसी की याद को लेकर निकला है मुसाफ़िर
न जाने किस तरफ़ किस ओर चला है मुसाफ़िर
न मंज़िल की तमन्ना है न ठिकाने की ही ख़बर
बस अपने आप में मगन चलता चला है मुसाफ़िर
कभी जो साथ थे, वो राह में बिछड़े ऐसे
कि मिलकर भी कभी पहले सा न मिला है मुसाफ़िर
बहुत चाहा कि लौटे उसी चौखट की तरफ़
मगर वक़्त कहां फ़िर पीछे मुड़ता है मुसाफ़िर
कभी आँखों में समंदर है कभी होंठों पे हँसी
न जाने कितने मौसम से गुज़रा है मुसाफ़िर
उसे मालूम नहीं कि मंज़िल मिलेगी या नहीं
मगर फिर भी उम्मीदों के संग चला है मुसाफ़िर
ये दुनिया भी अजब राह है, ठहरती ही नहीं
यहाँ हर शख़्स कहीं न कहीं का है मुसाफ़िर
- मीना गोपाल त्रिपाठी
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