बरसों बाद एक पुराना बन्द लिफ़ाफ़ा खोला
प्रेम से पगी वह मेरी माँ की चिठ्ठी थी
हां, पढ़ी थी बार-बार उसे वक्ष से लगाकर
वह मेरी मां की आख़री चिठ्ठी थी
कुशलक्षेम और ढ़ेर सारे प्यार के साथ
मां सदा अपना स्नेहिल आशीष भेजा करती थी
मैं उदास रहूं या दिल से मुस्कुराऊँ
चिठ्ठी के ज़रिए मां सदा आसपास हुआ करती थी
सबका ख़्याल रखना..अब अपना भी रखना होगा
यह हिदायत मां बार-बार दिया करती थी
कहीं लग जाए न मुझे बुरी नज़र किसी की
चिठ्ठी ही चिठ्ठी से, मां सारी बलाएं उतार दिया करती थी।
नही है आज वो बेशक मेरी दुनिया मे , पर
लिफ़ाफ़े में वह आज भी मुझमें बन्द रहती है
उदास होऊं या दिल से मुस्कुराऊँ..
मां सदा मेरे आसपास हुआ करती है।
मीना गोपाल त्रिपाठी
अनुपपुर (मध्यप्रदेश )
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