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मशगूल हूं मैं अभी अपने कब्र की तामीर में

                
                                                         
                            मशगूल हूं मैं अभी अपने कब्र की तामीर में,
                                                                 
                            
और वो मेरे रहने का पता ढूँढता है!

छोड़ आया हूँ मैं एक बेवफ़ाई वहां,
जहां सदियों से तू नूर-ए-वफा ढूँढता है!

अगर मां बाप में नहीं मिला तो फिर मिलने से रहा,
वो शख्स पागल है जो मस्जिद मे ख़ुदा ढूँढता है!

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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