जरा सा जी क्या लिए हम ज़िंदगी बुरा मान गई लगती है
कल हंसते देख लिया था शायद तभी तो आज आफ़तों की बाढ़ आई लगती है
मज़ा आर रहा है फिर भी इस हाल में शायद मुझको नई नई मोहब्बत हुई लगती है
आफ़तों को आदत बनाने की चाह सी है अब तो यकीनन ये हरकत तुम्हारे ख़ुमार की लगती है
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