मूरख हैं नहीं जानत हैं
कहैं परीक्षा लेवत हरि
पीर हमारी नहीं जानत है
पूछो जरा उन मूढ़ से
पीर हमार देह हमार फिर हरि भला क्यों रोवत है
पीर भी उसकी उसके हम
वो अनंत भला क्या पावत क्या खोवत है
सीख लें हम गिरना फिर उठना
लागत हमको बस हरि हमरो इतना ही चावत है
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