धर्म कर्म और अधर्म सभी तो हैं यहाँ फिर देखने कुरुक्षेत्र भला कोई और कहीं क्यों जाता है ,
उचित अनुचित की पहचान यहाँ केशव रूप हृदय स्वयं ही कराता है ,
हार जीत के इस युद्ध में देखो वीर कर्म पार्थं सा किए जाता है ,
धरो कान ज़रा ग़ौर करो देखो कान्हा भी मुरली बजाता है
ठिठक रहे नो तुम कहीं सद्मार्ग दिखलाता है
जो ना सुन सकोगे अँतःकरण तो याद रहे सुयोधन दुर्योधन बन जाता है
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