खुशनुमा मौसम आया है, शरद ऋतु मुस्काई है,
बदल रही है ऋतु अपनी चाल, नई छटा छाई है।
आश्विन मास की बेला में, नवरात्रि के दिन आए,
माँ दुर्गा के जयकारों से, गली-गली मुस्काए।।
बदल रहे मौसम के रंग, कहीं सर्दी, कहीं बुखार,
कभी धूप की तपिश सताए, कभी हवा की मार।
खरीफ की फसलें घर पहुँचीं, किसान के मन हर्षाए,
मेहनत के सुनहरे फल से, आँगन-आँगन भर जाएँ।।
त्योहारों का आगमन हुआ, बाजारों में रौनक है,
रंग-बिरंगी सजावट में, खुशियों की चमक है।
नवरात्रि और विजयादशमी, दीपावली का मान,
धनतेरस, गोवर्धन पूजा से महके, प्यारा हिंदुस्तान।।
शरद पूर्णिमा चाँदनी बिखेरे, करवा चौथ का प्यार,
चाँद निहारे व्रती सुहागन, सजे प्रेम का संसार।
खीर का भोग लगे चंद्रमा को, अमृत बरसे रात,
शीतल चाँदनी लिखती जाए, प्रकृति की मधुर बात।।
प्रकृति की अनुपम छटा निराली, मन को लेती मोह,
शीतल पवन, सुहानी रातें, चाँदनी का अद्भुत मोह।
ऋतु के इस सुंदर आँगन में, भावों का संचार,
मयंक के मन में जाग उठे फिर, कविता का संसार।।
शब्द-शब्द में ऋतु मुस्काए, भाव-भाव में प्यार,
कलम रचे मौसम की गाथा, सुंदर और साकार।
शरद ऋतु की इस बेला में, मन का यही विचार,
प्रकृति, पर्व और फसलें मिलकर, रचते नया शृंगार।।
-मयंकेश कुमार दुबे
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