ये जो मैं जी रहा हूं ,
जो ज़हर मै पी रहा हूं ।
कांटो की राह में ,
धूप भरी छांव में।
कभी आंसुओं की रेत हैं ,
कभी उदासियों की सेज हैं ।
जिंदगी निकल रही ,
स्वयं के सहते ताप में।
ये जो मैं सह रहा हूं,
जिंदगी से कह रहा हूं।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X