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यादों में जान

                
                                                         
                            इस दिल की ज़मीं पर कभी क्या गुलाब खिलेंगे?
                                                                 
                            
या ताउम्र ये रास्ते बस वीरान ही मिलेंगे?
ये किस्मत न जाने कब हमारा साथ देगी,
कब छूटेगा अंधेरा, कब मेरी जान मेरे साथ होगी?
इश्क़ कब मेरा मुकम्मल होगा ऐ ख़ुदा...
या बस यादों में ही मेरी जान होगी?
हाँ, बस यादों में ही मेरी जान होगी...

वो बेचारी मुझे याद बहुत ज़्यादा करती होगी,
पर उसकी सिसकियाँ सीने से बाहर निकलती नहीं होंगी।
मेरा दिल उस दर्द को हर पल महसूस करता है,
मुझसे मिलने को वो किस क़दर बेचैन रहती होगी।
पर ये दूरी न जाने अब कब ख़त्म होगी,
या शायद हम तब मिलें, जब ये ज़िंदगी ही ख़त्म हो...
इश्क़ कब मेरा मुकम्मल होगा ऐ ख़ुदा,
या बस यादों में ही मेरी जान होगी?

वो मासूम ये बिछड़ने का दर्द कैसे सहती होगी?
मैं यही सोच कर रोता हूँ, वो मेरे बिन कैसे रहती होगी।
अकेले में हर पल ही वो छुप-छुप कर रोती होगी,
और दुनिया से हँस-हँस कर, "मैं ख़ुश हूँ" ये कहती होगी।
कब पिघलेगा वक़्त का पत्थर, कब हमारी बात होगी?
कब थमेगा ये सफ़र, कब मेरी जान मेरे साथ होगी?

सीने में दफ़्न हैं जो आहें, वो कब आज़ाद होंगी?
क्या मेरी दुआएँ भी कभी यूँ आबाद होंगी?
इस दिल की ज़मीं पर कभी क्या गुलाब खिलेंगे?
या ये ज़मीं बस वीरान होगी...
इश्क़ कब मेरा मुकम्मल होगा...
या बस यादों में ही मेरी जान होगी...
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36 मिनट पहले

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