दूरियाँ बहुत हैं, जो कटती नहीं,
यादें उसकी दिल में मेरे सिमटती नहीं।
मैं सोचता रहता हूँ तुझे ख़यालों में,
अब इश्क़ मुकम्मल है बस ख़्वाबों में।
राहें तो खुली हैं पर क़दम चलते नहीं,
अश्कों के ये मौसम कभी बदलते नहीं।
मैं ढूँढता रहता हूँ तुझे सवालों में,
अब इश्क़ मुकम्मल है बस ख़्वाबों में।
तेरे बिना हर एक शाम, कितनी वीरान है,
सीने में दफ़न आज भी, हर वो अरमान है।
ख़ामोशियों ने घेर लिया है मेरी हर सांस को,
कोई तो जा के कह दे मेरे रूठे हमराज़ को।
तक़दीर की लकीरें क्यूँ बदलती नहीं,
इस दिल से तेरी हसरत, निकलती नहीं।
मैं जागता रहता हूँ सूनी रातों में,
अब इश्क़ मुकम्मल है बस ख़्वाबों में।
हकीक़त की ज़मीन पे तो हम अजनबी रहे,
दर्द के समंदर में बस यूं ही डूबे रहे।
चलो अच्छा है कि नींदों में कोई पहरा नहीं,
वहाँ बिछड़ने का कोई ज़ख़्म भी गहरा नहीं।
सांसों की ये उलझन कभी सुलझती नहीं,
तन्हाई भी अब मुझसे कभी उलझती नहीं।
मैं जी रहा हूँ अब तो तेरे ही हवालों में,
अब इश्क़ मुकम्मल है बस ख़्वाबों में।
वादे जो किए थे वो हवाओं में खो गए,
हम मुस्कुराते चेहरे के पीछे ही रो गए।
आइना भी पूछता है अब तो हाल मेरा,
बिना तेरे गुज़रता है कैसे हर साल मेरा।
कसक ये पुराने ज़ख़्मों की मिटती नहीं,
धड़कन भी तेरे नाम बिना टिकती नहीं।
मैं हार के बैठा हूँ ग़म के बाज़ारों में,
अब इश्क़ मुकम्मल है बस ख़्वाबों में।
दूरियाँ बहुत हैं, जो कटती नहीं,
यादें उसकी दिल में मेरे सिमटती नहीं।
मैं सोचता रहता हूँ तुझे ख़यालों में,
अब इश्क़ मुकम्मल है बस ख़्वाबों में...
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