जिंदगी न जाने मुझे किस दोराहे पर कर गई
अब तो जिंदा रहने की इच्छा ही मर गई
मैं एक जिंदा लाश बनकर घूम रहा हूं
बस अपनी ही गलतियों को ढूंढ रहा हूं
किसी को मुझ पर अब एतबार नहीं है
मेरी सच्चाई से किसी को सरोकार नहीं है
दर्द जब सहा नहीं जाता तो लिख लेता हूं
अल्फ़ाज अपने कागज पर उतार लेता हूं
मेरी कलम भी मुझे अब टोकने लगी है
जज़्बात दिल के लिखने से रोकने लगी है
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