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यायावर

                
                                                         
                            मैं प्रकृति का अंश हूं
                                                                 
                            
वंश भी प्रकृति का ही हूं
कहने को स्थावर, है मानव
धरनी पे रहने आया है
लेकिन छोड़ प्रकृति के द्रुमों को
नए-नए शहर बसाता आया है
गांवों में तो स्थावार था, मानव
इस शहर ने ही
मानव को यायावर बनाया है
हवा, झरना रौशनी
जग के सारे मौसम-मौसमी
सारे अंश हैं, यायावरी के
ठहरते नहीं वे कहीं एक स्थान
गतिशील हो बहते रहते
नदी -नदी, गली-गली
उन्हें देख पूर्णतः ने तो नहीं
कुछ ने बहना स्वीकारा है
त्याग कर घर का आनंद
अनजाने शहरों का दरवाजा खटखटाया है
कारण भी यायावरी का
कुछ है, अजीब सा
जब मानव के मन में
उठी उत्कंठा, क्यों सदा रहेगा
एवरेस्ट पर्वत सबसे ऊंचा
इसी विचार ने मानव को उकसाया है
चढ़ उसके सर्वोच्च शिखर पर
रार उसने ठाना है
यही प्रकृति है, यायावरी की
जिसने अनजाने शहरों में
पहचान उसने नया बनाया है
पहचान उसने नया बनाया है।
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3 वर्ष पहले

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