विरह वियोग
अवसाद विषाद
मैं कया जानूं ?
मैं वियोगिनी
जन्म जन्म से
मैं तो सिर्फ
तुम्हें हो पहचानूं।।
नित्य निकलती हूं
इच्छा धर
तुमसे मन से मिलने
मिल जाते पथ में
ठोकरें दे जाते पुनः
वियोग
रह जाते मिलन
अधूरे ,
यद्धपि
जीवन पथ रहता
सदा गतिमान
मिटता नहीं, परंतु
अवसादों का फेरा।।
विरह वियोग
अवसाद विषाद
मैं क्या जानूं?
में वियोगिनी
जन्म जन्म से
मैं तो ,सिर्फ
तुम्हें ही पहचानूं।।
- मनोज सिन्हा
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