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वस्त्र

                
                                                         
                            पहले कुछ भी न था
                                                                 
                            
पत्ते थे
उसके बाद
पेड़ों के छाल आए
जानवरों के खाल आए
तब भी मानव
आज के मानव से
अच्छा था
सुसंस्कृत था
यद्यपि पढ़ा लिखा नहीं था
लेकिन संतृप्त था
सागर और क्षितिज के समान
नहीं थी उसकी महत्वकांक्षाएं
बल्कि सीमित थी सारी इच्छाएं
तब वह इंसान था
लेकिन वर्तमान से पृथक इंसान
सृजन का भाव लिए
प्रेम का सौहाद्र भरे
निर्मल तन मन और संस्कृति युक्त था वह
बिना शिक्षा लिए सुसंस्कृत था वह।।
- मनोज सिन्हा
 
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एक वर्ष पहले

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