बसा कर
हृदय में
तेरी ही मूर्ति
हे!देव
अर्पित है
समग्र विनम्र
श्रद्धा-भाव
और स्तुति
तेरी उपासना से
मैं पा जाता हूं
नित्य तेरी प्रतिध्वनि
यह ध्वनी दे जाती है
जीवन की निश्छलअनुभूति।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X