तुम्हारे सुसुप्त सारे भावों को
जगाने आया हूं! प्रिय
नव -वसंत में उगे नव- किसलय पातों को
उपवन में खिले सुंदर फूलों को
उपहार समझ तुम्हारे लिए लाया हूं ! प्रिय।।
न करना अस्वीकार ! प्रिय
तुम्हें ही रिझाने लाया हूं
गीतों के दो मीठे बोल रचकर
तुम्हें ही सुनाने आया हूं।।
मिलन के आशा में ढलकर
प्रेम -बंध में बांधने आया हूं
तुम असूत्र ही बंध जाना! प्रिय
मनोकामना यही रख कर आया हूं
समग्र उपहार भावों से
तुम्हारे लिए ही लाया हूं।।
-मनोज सिन्हा
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