हे! जगदीश
हे! मानव के प्रथम उद्धारक
तेरी चरणों में
नित्य वंदन- स्तुति करते हैं
आशा -अभिलाषा
कल्याण की आकांक्षा रख
पुष्प- धूप- चंदन- रोड़ी प्रसाद
तुम्हारे चरणों में अर्पित करते हैं
हे! प्रभु
देना प्रांजल प्रकाश ऐसा
प्रशस्त हो समस्त क्षेत्र जीवन का
रहे ना तनिक सा
जीवन के मार्ग
विघ्न- बाधा- व्यवधान
सरल रहे मार्ग हमारा
उपवन चमन सा
मिलें मार्ग में काटें अवश्य
परन्तु उन्मूलित करना कांटों को तुम्हीं
हम तो हैं, प्राणी- नादान
भटक जाते है
कभी -कभी मार्ग
मार्ग प्रशस्त करना हे! प्रभु
हम है, अज्ञानी और नादान
हम हैं, अज्ञानी और नादान।।
- मनोज सिन्हा
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