प्राणों की सरल रेखाओं में
समाया जग की विरह वेदना
आकुल नयन मूक रह कर
करती स्वयं की निर्भय विवेचना
घन- सघन सा दुख का क्षितिज
जिसका दिखता आदि न अंत
कैसे रहूं , प्रिय तुम बिन ,छाया है
जीवन के चारों ओर अंधेरा घनघोर
आ जाती जो तुम मेरे जीवन के पथ
खिलता हृदय के सरोवर में कुसुम अनेक
निहार- निहार उसे मैं पा जाता लक्ष्य जीवन का सुमधुर
आना अवश्य मेरे उर के स्मित पथ में
मिल मुझसे कह जाना जितना जी चाहे
धैर्य से मैं सब सुन लूंगा तुम्हारे मन का मर्म
परंतु एक बार तो तुम्हें आना ही होगा
अभिव्यक्त होने मेरे स्मित के पथ
अभिव्यक्त होने मेरे स्मित के पथ।।
-मनोज सिन्हा
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