आस्था और विश्वास
संचित हैं, ह्रदय के
हर अंश, हर कण में
जैसे संचित हो अश्रु-जल
कोटि-कोटि नैनों में
भाव भरे हैं, राज-कण में
अंबक मूंद शीश झुकाते हैं
हे! देवश्रेष्ठ तेरे पावन चरणों में
विश्वास हृदय में बसा
वह मानक मूल्य है
जो सनातन है, आदि काल से
सागर की गरजती लहरों में
पर्वत की ऊंची शिखरों पे
भूतल की अचल गहराइयों में
रहती है आस्था विहंगम नाना रूप में
दे देना, प्रभु अंजुरी भर कर स्नेह
धन्य-धन्य हो जाए मेरा जीवन ।।
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