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शब्दांश

                
                                                         
                            मैं शब्दांशों का बिंब हूं
                                                                 
                            
मुझमें बसता है, प्रेम- नीर
बहती हूं ,मैं
सबमें निरंतर -अविरल
मैं ही जीवन का आधार हूं
मेरे स्वरूप का सौंदर्य है
सागर -पर्वत सा
गहराई/ ऊंचाई में उसकी
जितना जाओगे
शब्दांशों का
मर्म उतना ही समझ पाओगे
मर्म उतना ही समझ पाओगे।।

जीवन जब होगा
शब्दों के बिना
जग होगा सूना- सूना
धन संपदा से होगा ! यद्धपि
जीवन भरा -पूरा
परंतु रिक्त होगा
जीवन का हर कोना- कोना।।

शब्द- बिंबों का विकल्प नहीं
बिंब ही जीवन का सकल है
शब्द बिंब -प्रतिबिंब के बिना
अर्थ जीवन का नहीं रह जाता है
भाषा -शब्द -साहित्य नहीं तो
कुछ भी नहीं
भाषा -शब्द -साहित्य है, तो
सब कुछ सरल स्पष्ट है।।

मैं शब्दांशों का बिंब हूं
मुझमें बसता है, प्रेम- नीर
बहती हूं ,सबमें निरंतर -अविरल
मैं ही जीवन का आधार हूं।।

- मनोज सिन्हा
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2 वर्ष पहले

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