बरसा बूंद बूंद
मेघों से
नेह तुम्हारा
सावन बन कर
भींगो गया
मेरे तन मन का आंगन
सावन बन कर
बिना मेघ
बरसा नैन
सूख गया
नन्हा पौधा
विरह की धूप में
नहीं आया
मेरे जीवन में
अभी सावन।।
अभी अभी
सावन आया
झूम झूम
हवाओं में
घूम घूम
मोती सी बूंदों की लड़ियों में सज
कहा मुझे स्पर्श कर
व्यथा में क्यों तुम रहते हो?
झगड़ा तुम मुझसे क्यों करते हो?
मैं परेशान हूं
काले- भूरे मेघों की चालाकियों से
छद्म मेघ हैं , बहुत
आते और न जाने
कहां चले जाते हैं?
ठगा सा रह जाता हूं , मैं
उनकी शरारतें देख देख
तुम न होना परेशान
मैं घटा बन कर हूं
तुम्हारे ही आस- पास
तुम्हारे ही आस- पास ।।
।। मनोज सिन्हा।।
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