आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सौगातें

                
                                                         
                            ये धूप
                                                                 
                            
ये बारिश
ये हवा
ये पानी
मेघ
तारे-सितारे
भास्कर और चांदनी रातें
सब मिले प्रकृति से
सौगातें बेमिसाल !!

परंतु जमाने से क्या मिला मुझे?
ले दे के मेरे
मरासिम थे ,अपने-अपने
उसी में मिले, मुझे
दर्द न जाने कितने?
एक एक कर बताता हूं
ये रिश्ते
ये नाते
ये दिखावे
नफ़रत के सबब
वफ़ादारी की परख
क्या कुछ नहीं मिला मुझे?
हां! देनेवाले लोग!
पराए नहीं
सभी अपने थे
ये ज़िंदगी के सच और
वाक़िफ सारे गम।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर