सर्वव्यापकता
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मैं कण -कण
में हूं, व्याप्त
धरा से व्योम तक
कभी तारापथ में
टिम -टिम करती हूं
कभी रज कण बन
हवा के झोंको में
उड़ जाती हूं
मैं हूं , धूल -कण
तेरे चरणों की
अनमोल मिट्टी
बन कर रहती हूं
मैं कण -कण में
हूं, व्याप्त------।।
मैं हूं, वसुधा
क्षुधा सबका
भरती हूं
जब नन्हें पौध
उगते है , उपवन में
फूलों से लद जाती हूं
फिर बन कर हार
जीवन में मंगल -बोध
बन कर आती हूं
कभी ईश के चरणों में
कभी पूजा की थाली में
श्रृंगार प्रसाधन बन जाती हूं।।
मैं कण -कण में
हूं व्याप्त
धरा से व्योम तक
धरा से व्योम तक।।
- मनोज सिन्हा
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