एहसास कभी-कभी नहीं
अक्सरहां मुझे होता है
वो किताबों का लेना-देना
बीच-बीच में, चलते-चलते
छिपकर कनखियों से देखना
क्या हुआ जो
बात गुज़रे ज़माने की है
ख्वाबों में वह अब भी है
पर, ख़्वाबों में रहना एक बात है
ज़िंदा रूह के बग़ैर
क्या सुकून क्या ख़्वाब
आज भी मैं अपने शहर की
उन राहों पर कुछ
सोच कर गुज़र जाता हूं
जिन राहों से होकर, हमदोनों
मिलकर साथ चले थे, कभी ।।
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