श्रद्धा को अर्पित कर
तेरे हृदय से पूछता है, मन
क्या? तुझमें भी उत्पन्न
होती है, श्रद्धा का समभाव
जीवन के पथ क्रम?
मुखर होते हो या मौन
प्रखर होते हो या निस्तेज
यह पक्ष तेरा है, तू ही जाने
मैं तो जानूं अपनी श्रद्धा - समग्र
मैं तो जानूं, अपनी श्रद्धा -समग्र।।
- मनोज सिन्हा
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