ऊंचाइयां देखी पर्वत सी
गहराइयां देखी सागर सी
उथली जमीं टापू बनते देखा
देखा न रुकते समीर को
तुम ठहरे हो क्यों ? निकल पड़ों सुदूर को।।
गिरते- पड़ते- चलते रहना
कलि से फूल बनते रहना
मिट जाना तुम्हारा हिस्सा नहीं
सृजन तुम्हारा अधिकार है
पाना सरल -सहज सारा
जीना भी हो कर निर्मल -निश्छल
झुकता तो बरगद है, बबूल कहां?
छाया भी देता बरगद ही
बहना नद सा,
बहना समीर सा
बह कर देना तुम ! सार्वभौमिकता में जीवन
शशि -मार्तंड सा जो रहता सदा
सम सा , संत सा,
ऋतु बदलते रूप बदल- बदल कर बहरूपिया सा
तुम नहीं बदल जाना ऋतु सा।।
तुम नहीं बदल जाना ऋतु सा।।
- मनोज सिन्हा
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