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प्रकृति का दोहन

                
                                                         
                            देखो आसमान
                                                                 
                            
क्यूं हो गया है, लाल
शायद धरती के अंधाधुंध दोहन से
वह हो गया है, परेशान
ओढ़ता नहीं अब वह
भूरे, काले वस्त्र
सुखी धरती लगती
है, उजड़ी- उजड़ी सी
सूरज के रोष- क्रोध से
ले आओ कुछ पूजन की सामग्री
कुछ होम कर दो , उसमें अपनी नादानी
शायद लौट आए
आसमां के अधरों पे मुस्कान
झूम_ झूम कर फिर वह पहले जैसा बरसे
वसुंधरा भी मन से भींगे
आएगी हरितिमा पुनः धरती पे
लेकर अपनी मनोहरता और लालित्य
लेकर अपनी मनोहरता और लालित्य।।

- मनोज सिन्हा 
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2 वर्ष पहले

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