आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्रभु के द्वार

                
                                                         
                            सप्त राग
                                                                 
                            
सप्त भाव
सप्त तारों सा
मन के नभ पर
सप्त रंगों में सजता
इंद्रधनुष सा बारंबार
जब जब होता प्रभु वंदन
प्रभु के द्वार!
खुलता जाता
द्वार मन का मन से
होता जाता सर्वकल्याण
हे! हरि
प्रशस्त करना तुम
जीवन का दुर्दम्य राह
देना मोक्ष मुक्ति का ज्ञान
देना मोक्ष मुक्ति का दान।।

-मनोज सिन्हा
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर