सप्त राग
सप्त भाव
सप्त तारों सा
मन के नभ पर
सप्त रंगों में सजता
इंद्रधनुष सा बारंबार
जब जब होता प्रभु वंदन
प्रभु के द्वार!
खुलता जाता
द्वार मन का मन से
होता जाता सर्वकल्याण
हे! हरि
प्रशस्त करना तुम
जीवन का दुर्दम्य राह
देना मोक्ष मुक्ति का ज्ञान
देना मोक्ष मुक्ति का दान।।
-मनोज सिन्हा
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