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प्रतीक्षा

                
                                                         
                            थकी हुई नैनों का श्रृंगार
                                                                 
                            
कब तक करोगी इंतजार
चलो चले कोई और राह
पथिक और मिल जायेंगे
जीवन -संगनी बन जायेंगे
अब कब -तक करें विलाप
अरसा वक्त बीत गया ,पर
उसने न की मेरी परवाह
काश! वह स्त्री होता,तो
वेदना स्त्री की वह जानता
व्यथा को वह समझ पाता
परंतु वह तो यात्री मुझे
अनंत पथ का है, लगता

लेकिन, मैं उसके बिना
न रह पाऊंगी, वह, वो
नहीं जिसे मैं , न पहचान
पाऊंगी, हो सकता है
अड़चन विकट कोई आया
होगा, तभी वह आ न सका
वह मेरा मनमीत है ,सुंदर
सापेक्ष ,गंभीर, प्रवीण
मैं, करूंगी ,सब्र और इंतजार
वो आएगा , मधुर सावन में
इस बार।।

-  मनोज सिन्हा
 
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2 वर्ष पहले

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