निर्विकार भाव
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चिर -संचित -विराग
मेरे विलोचन में बसते कहां?
चिर -प्रेम- सानिध्य
मेरे अंतर्मन में बसता
करुणा -विषाद रहते मुझसे कोसों दुर
अरुण की अरुणिमायुक्त
विचार मुझमें है, बसता।।
रंगीले घन आते -जाते
विचलित मैं नहीं होता
मौलिकता में रहता सदा
झंझावातों से मैं नहीं घबराता
भोर पहर आता, मैं
जीवन - पथ पर
सांझ नित्य लौट जाता, में
अस्ताचल के सदन
युग युग से चल रह यही कहानी
विधि -विधान प्रकृति का सदृष्य चल रहा
करुणा विषाद का पथ मेरे जीवन में आया कब?
मेरे जीवन में आया वह कब?
- मनोज सिन्हा
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