सत्य से परे रहे
जो यथार्थ अभी तक
न जाने कब हमसे
दूर चले गए वे
अपनी निहितार्थ लेकर।।
पाना तो बहुत है
खोने को शेष कुछ नही है
जबसे मिथ्या मिली, हमसे
सत्य छोड़ गया हमें तभी से।।
शिखर को छूने की आकांक्षा
भला किसे नहीं है?
लेकिन दूर हो जाना मूल से
क्या बहुत जरूरी है?
वास्तविकता और बनावटीपन में
मात्र सूक्ष्म सा भेद है
यह अभेद्ध अब तक इसलिए है
क्योंकि! हम सभी मूल से दूर हैं।
घास,वृक्ष, नदियां और पहाड़
प्रकृति के हैं, विशिष्ट उपहार
वे मूल को पकड़े रहे, मौलिक रहे
तुम्हीं बताओ, हम कहां हैं ! खड़े
सोचना नितांत जरूरी है
अपने नीरव से जीवन के
मधुरतम एकांत में
जब वहां पहुंच जाओगे
तब कुछ पा ही जाओगे
पाने का अर्थ होगा
प्रकृति को स्वीकारना
स्वीकारने का तात्पर्य होगा
बनावटीपन को त्यागकर
मौलिकता को स्वीकारना।।
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