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मेघराज

                
                                                         
                            बरस गए नभ से
                                                                 
                            
स्नेहिल बूंदों की
रिम-झिम फुहारें
वसुंधरा भींगी
देह भींगा
एक साथ दे गया
बोधमय आनंद
फिर एक बार
फिर एक बार।।

उसके आगमन से पहले
ग्रीष्म ऋतु ने किया था, तुमुलनाद
झुलस गयी थी, धरती
बायरों से फट गयी थी, धरती
ऐसे में तुम्हारा शुभागमन
उष्णता के विरुद्ध था, शंखनाद!!

तुम्हारी प्रतीक्षा रहेगी
हे! मेघों के नृप इंद्र
विहंसना वसुंधरा के लिए
बार-बार, बारंबार और
बरसाना नन्ही बूंदों की फुहार !!
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3 वर्ष पहले

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